किसी गाँव में एक उच्च कुल का क्षत्रिय परिवार निवास करता था। उस परिवार में दो भाई थे और एक उनकी माता। वीरता उनका आभूषण थी और शक्ति उनकी संगिनी। परिवार सुखपूर्वक रह रहा था । एक दिन परिवार की सुख-समृद्धि पर वज्रपात हो गया। छोटे भाई की अनुपस्थिति में बड़े भाई की किसी ने हत्या
कर दी। हत्या करते ही हत्यारा भाग गया। कोई उसे देख तक नहीं पाया। पुत्र की हत्या का समाचार सुनकर माँ का कलेजा फट पड़ा। उसकी आँखों से अविरल अश्रु धारा बह निकली। पुत्र का शव देखकर उसका हृदय ममता के प्रवाह में बह चला। रोते-रोते हृदय पत्थर की भाँति कठोर हो गया। हत्यारा यदि उनके सामने होता तो उनकी अँखों की चमक से ही भस्म हो जाता। शोक ने क्रोध का रूप धारण कर लिया था। छोटा भाई शाम को घर लौटा। भाई का शव देखकर वह बहुत दुःखी हुआ। क्रोध से उबलती हुई माँ बोली, "तुम क्षत्रिय हो। हत्यारा बचना न चाहिए। जो वार खाकर भी बैठा रहे, वह क्षत्रिय नहीं होता। तुमने मेरा दूध पिया है, दूध की आन निभाओ।"
माँ की इन बातों से उसके खून में खूब उबाल आया। उसने अपनी तलवार निकाल ली और बोला, "माँ तुम्हारे दूध की आन जरूर निभाऊँगा। मैं तुम्हारे सामने ही हत्यारे का सिर अपनी तलवार से काटूंगा।"
माँ बोली, "यही करो पुत्र। क्षत्रीय पर तो किसी की आक्रमण करने की हिम्मत तक नहीं होनी चाहिए, ऐसा असर होना चाहिए। अब हत्यारे से ऐसा बदला लो कि आगे कोई तुम्हारी तरफ आँख उठाकर न देख सके। जो अपने शत्रुओं को ऐसा सबक न सिखा सके, वह वीर नहीं कायर है।" छोटा भाई यह सुनकर खड़ा न रह सका। उसका क्रोध चरम सीमा पर पहुँच गया था। "शत्रु को बन्दी बनाये बिना वापस न लौटूंगा" कहकर वह चला गया।
उसने देश का कोना-कोना छान मारा। जंगल तक में ढूंढा। भयंकर पशु भी उसकी तलवार देख कर भाग खड़े होते। नगर क्या, गाँव क्या, सब तरफ उसकी नगी तलवार घूमी। घूमते-घूमते बारह वर्ष हुए तो शत्रु का सुराग मिला। बिना एक भी पल गंवाये उसने शत्रु को बन्दी बना लिया। उसकी जवान पत्नी, छोटे-छोटे बच्चे, बूढ़ी माँ, सब रोते-पीटते रह गये। बारह वर्ष का वक्त कम नहीं होता । इतने दिन बाद घर पहुँचा। उसकी आँखों में विजय की चमक थी। बन्दी हत्यारें को मौँ के सम्मुख प्रस्तुत करके बोला, "लो माँ, मैंने तुम्हारे स की आन निभा दी है। अब इस तलवार से स्वयं ही इसका सिर काट दो।" बन्दी को मृत्यु साक्षात नजर आ रही थी। वह गिड़ गिड़ाकर
प्राणों की भीख मांग रहा था। उसने अपनी जवान बीवी के औँसुओं का, मासूम बच्चों का और माँ के बुढ़ापे का वास्ता दिया परन्तु क्षत्रिय वीर न पसीजा। वह दौँत पीसकर बोला, "इस माँ के दर्द को नहीं पढ़ रहे हो क्या? भाई को मारते समय भी क्या तुमने ऐसा सोचा था ?" कहकर उसने हत्यारे को और पीड़ा दी। माँ बोली, "तलवार तुम अपने ही पास रखो। तुम ही भाई का बदला लो।" क्षत्रिय वीर उसे मारने का उपक्रम करने लगा। अचानक
माँ ने सोचा, इसे मारने से मेरा पुत्र तो वापस नहीं आ जाएगा। फिर इसकी माँ को आँसुओं के सैलाब में क्यों डुबोऊ ? इसके हन्ता को जीवित छोड़ेगें? यह विष-बेल क्या बच्चे क्या इस हत्या से थम जाएगी? यह तो इसका आरम्भ ही होगा। बदले की इस आग को बुझा देना ही बेहतर है। अपनी बहू के समान इसकी पत्नी को भी विधवा बना दूं यह मुझसे न होगा।" वह बोल उठी, "रूको पुत्र।" उसने तलवार उठायी ही थी कि थम गया। उसने प्रश्नवाचक नजरों से माँ की ओर देखा। "पुत्र, इसे छोड़ दो।" माँ दयालुतापूर्वक बोली। वह चौक गया और बोला, "यह क्या कहती हैं आप? बारह साल बाद दुश्मन मिला और फिर इसे जीवित छोड़ दें।
यह असम्भव है।" माँ बोली, "बेटा, यह हमारे घर में है इसलिए अतिथि है, अतिथि को मारना धर्म नहीं और यह बार-बार गिड़गिड़ाकर प्राणों की भीख मांग रहा है, पीठ दिखाकर भागते शत्रु पर क्षत्रिय वार नहीं करते।" वह रुक गया था। "सुनो, क्रोध से क्रोध को जीता नहीं जा सकता। खून का दाग खून से नहीं धोया जा सकता। हत्या के बदले हत्या उस विष वृक्ष की जड़ बनेगी जिसका फल न जाने कितनी सुहागनों को विधवा और कितने बच्चों को अनाथ बनायेगा। सुनो, इसके बच्चे इसकी मृत्यु पर चुपचाप नहीं बैठेंगे, व मा उसी तरह बदले के लिए निकलेंगे, जिस तरह तुम 12 साल पहले निकल पड़े थे इसलिए इसे छोड़ देने में ही कल्याण है। क्रोध को क्षमा से ही जीता जा सकता है।" पुत्र ने तलवार फेंक दी और बन्दी रिहा हो गया।
