एक महापुरुष के पास एक बार एक सज्जन आये। नम्रता पूर्वक कहने लगे," महाराज! तंग हो गया हूँ। लगता है जीवन दुःखों का ही दूसरा नाम है। घर जाता हूँ तो बीवी लड़ती है. बाहर जाता हूँ तो दोस्त तंग करते हैं। कोई किसी की चुगली करता है तो कोई ईष्ष्या से जला-भुना रहता है। समझ में नहीं आता क्या करूँ ? जी चाहता है, आत्म हत्या कर लूँ। आखिर क्या लाभ इस दुनिया में रहने का ? जहाँ प्यार का नामोनिशान नहीं।" कहकर वह चुप हो गया| उसकी आख में आँसू भी आ गये थे।
महापुरुष बोले, "भूखे आदमी से एक बार किसी ने पूछा कि दो और दो मिलकर कितने होते हैं। भूखा बोला कि दो और दो होते हैं- चार रोटियों। जिस प्रकार भूखे को हर चीज रोटी नजर आती थी इसी तरह तुम्हें भी हर कहीं दुःख ही दुःख नजर आता है। घास पर औस के कण चमक रहे थे। सुबह का वक्त था। एक काव आया। वह मुस्कुरा रहा था। सुबह की शीतल हवा में उसको विचार उड़ रहा था। वह मुस्कुराकर बोला, "वाह ! मोती ही मोती! पौधों के ऊपर चांदी के मोती।" तभी सामने से एक और आदमी आया। उसके बाल उलझे हुए थे। कुर्ते पर सलवटें ही सलवटें थीं। दाढी बढ़ी हुई थी और ऑँखें सूनी थीं। देखते ही बोला, "चलो एक और मिला मेरे जैसा। रात को आसमान भी रोया है मेरी तरह।"
वही घास थी, वही ओस थी, एक उन्हें चांदी के मोती कह रहा था, तो दूसरा उन्हें आसमान की आँखों से टपके औँसू। आखिर फर्क कहाँ था? मैं तुम्हें बताऊँ! फर्क उनके दृष्टिकोण में था। पहला खुश था, दूसरा दुःखी। सुखी ने ओस को भी मोती समझा, दुःखी ने ओस को ही औँसू। फर्क सिर्फ दृष्टिकोण में धा। तुमने जीवन को अभी दूसरे आदमी के दृष्टिकोण से देखा है। यह दृष्टिकोण अधूरा है। कल आना मैं तुम्हें जीवन जीने की कला सिखाऊंगा।"
वह बहुत उतावला था। अगले दिन सुबह सवेरे उठकर जल्दी ही पहुँच गया। महापुरुष के चरणों में प्रणाम करके बैठ गया। महापुरुष बोले, "जीवन जीने की कला सीखने आये हा? "हाँ, महाराज!" उसने संक्षिप्त में उत्तर दिया। "रामधाट पर लगा स्तम्भ देखा है ?" महापुरुष बोले। "जी हाँ, महाराज! खूब अच्छी तरह देखा है।" वह बोला।" उसी के पास जाओ। जाकर जितनी स्तुति कर सकते । हो, उस स्तम्भ की करो। कल फिर आना। कहकर महापुरुष चुप हो गये।
वह आदमी सीधा रामघाट की तरफ चला गया। वहाँ कोई नहीं था। पास ही नदी बह रही थी। आवाज करती। उसने बहुती नदी में स्नान किया और स्तम्भ कल-कल की की ओर चला गया। पहले स्तम्भ के आगे सिर नवाया तत्पश्चात कहना शुरू किया, "हे महान स्तम्भ! तुम सद्वृत्तियों का उदय करने वाले हो। तुम्हें न कोई आंधी उखाड़ सकी, न तूफान। तुम्हारी जड़ें पाताल तक हैं। लाल पत्थर से बना तुम्हारा शरीर ऐतिहासिक लाल किले से भी सुन्दर है।" बस इसी तरह प्रशंसाएं - स्तुतियों करता रहा। शाम हुई तो घर चला गया।अगले दिन सुबह-सुबह फिर महापुरुष के चरणों में पहुँच गया। महापुरुष बोले, "कल जैसे कहा था किया ?" "हों, महाराज! बिल्कुल वैसा ही। पूरे दिन स्तुतियों करता रहा मैं।" उस आदमी ने कहा। "आज फिर जाओ। आज दूसरा काम करना है।" महापुरुष बोले। "क्या? आज भी स्तुति ?" वह एकदम बोला। "अरे अधीर मनुष्य। मेरी पूरी बात तो सुनो! आज तुम्हें स्तुतियों नहीं करनी, बल्कि गालियाँ देनी हैं। जितने अपशब्द बोल सकते हो, बोलने हैं।" कहकर महापुरुष चुप हो गये। "कमाल करते हैं आप! जिसकी कल प्रशंसा कर रहा था. उसे ही आज गालियाँ देनी हैं। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है। आखिर एक ही को गालियौं और स्तुतियोँ! यह तो मुश्किल है।" वह बोला। "क्या कहते हो? क्या गाली उसी को नहीं देते, जिसे जानते हो, जिसकी कभी तारीफ़ करते हो ? किसी अंजान आदमी से भी लड़े हो कभी ? जिसे जानते ही नहीं उसकी क्या खाक़ स्तुति करोगे? उससे क्या खाक लड़ोगे? अरे जिसे जानते हो, उसी की तो स्तुति करते हो । उसी को ही तो गालियों देते हो।" महापुरुष बोले। बात उसकी समझ में आ गयी थी। इसलिए बिना कुछ कहे रामघाट चला गया। आज वह नहाया नहीं। बस सीधा खड़ा हो गया और लगा गालियाँ बकने । "तुम्हारा रंग कितना बुरा है, खून जैसा रंग। खम्भे की तरह खड़े हो, न छाया, न फल। बस खड़े हो, शैतान की तरह। अरे क्यों जगह घेर रखी है तुमने ? वैसे ही हिन्दुस्तान की आबादी दिन-रात समय की तरह बढ़ रही है।" बस इसी तरह बोलता गया। जो मुँह में आया बोलता गया। आखिर शाम को फिर वापस चला आया। अगले दिन सुबह फिर महात्मा के पास पहुँच गया। महात्मा बोले, "वत्स! सीख गये जीवन जीने की कला? "
"महाराज, क्या है, जीवन जीने की कला ? आज प्यार करो कल लड़ पड़ो। अगर यही जीवन जीने की कला है तो इसे मैं पहले ही जानता हूँ। यूँ ही तीन दिन खराब करवाये आपने ।" वह बुरा सा मुँह बनाकर बोला। "अरे अधीर मनुष्य। तुम्हारी प्रवृत्ति के लोग ही लक्खी बंजारे की तरह वफ़ादार कुत्ता मारकर पछताते हैं। अरे! मेरी पूरी बात तो सुन!" महापुरुष बोले। "जी कहिए" कहकर वह चुप चाप बैठ गया । महापुरुष कुछ देर चुप रहे । उन्होंने जब देखा कि वह पूरी तरह शान्त है तो बोले," वत्स! परसों जब तुम पहली बार उसके पास से स्तुतियों करके लौटे थे तो क्या उसने कुछ इनाम दिया था।""जी नहीं महाराज! बल्कि मेरा तो पैर फिसल गया था जिससे मैं गिरता-गिरता बचा। फिर भी मैं स्तुति ही करता वह बोला। "जितनी बात पूछे सिर्फ उतना ही जवाब दो वत्स! अधिक बोलने वाले लोग ज्ञानी नहीं होते। अच्छा एक बात और बताओ रहा कल जब तुम सखूब गालियोँ बककर आये तो क्या स्तम्भ ने कोई नफ़रत दिखायी थी ? या किसी किस्म का वार किया क्या?" महात्मा बोले। "नहीं महाराज, कल तो कुछ नहीं हुआ।" वह आदमी बोला। "बस इसी तरह का जीवन जियो वत्स! उस स्तम्भ की तरह हो जाओ। स्तुतियों सुनने पर फूलो नहीं और गालियाँ सुनने पर बिदको नहीं। प्रशंसाओं व अपशब्दों से ऊपर उठो। याद रखो, किसी की प्रशंसा से तुम्हारे गुण या सद्कर्म बढ़ नहीं जाएंगे और आलोचना व घृणा से तुम्हारे सद्कर्म दुर्गुणों में नहीं बदलेंगे। जो तुम हो, वह हो। अपने आपको पहचानो। अपनी शक्ति को, क्षमता को पहचानो। इसे पहचान लोगे तो फिर कोई तुम्हें दुःखी या परेशान नहीं कर सकेगा। निर्लिप्त भाव से जीवन जियोगे तो सुख तुम्हारे पीछे भागेंगे।" यह कहकर महात्मा चुप हो गये। वह आदमी शान्त भाव से वापस लौटा और फिर उसने सुखी जीवन जिया।
महापुरुष बोले, "भूखे आदमी से एक बार किसी ने पूछा कि दो और दो मिलकर कितने होते हैं। भूखा बोला कि दो और दो होते हैं- चार रोटियों। जिस प्रकार भूखे को हर चीज रोटी नजर आती थी इसी तरह तुम्हें भी हर कहीं दुःख ही दुःख नजर आता है। घास पर औस के कण चमक रहे थे। सुबह का वक्त था। एक काव आया। वह मुस्कुरा रहा था। सुबह की शीतल हवा में उसको विचार उड़ रहा था। वह मुस्कुराकर बोला, "वाह ! मोती ही मोती! पौधों के ऊपर चांदी के मोती।" तभी सामने से एक और आदमी आया। उसके बाल उलझे हुए थे। कुर्ते पर सलवटें ही सलवटें थीं। दाढी बढ़ी हुई थी और ऑँखें सूनी थीं। देखते ही बोला, "चलो एक और मिला मेरे जैसा। रात को आसमान भी रोया है मेरी तरह।"
वही घास थी, वही ओस थी, एक उन्हें चांदी के मोती कह रहा था, तो दूसरा उन्हें आसमान की आँखों से टपके औँसू। आखिर फर्क कहाँ था? मैं तुम्हें बताऊँ! फर्क उनके दृष्टिकोण में था। पहला खुश था, दूसरा दुःखी। सुखी ने ओस को भी मोती समझा, दुःखी ने ओस को ही औँसू। फर्क सिर्फ दृष्टिकोण में धा। तुमने जीवन को अभी दूसरे आदमी के दृष्टिकोण से देखा है। यह दृष्टिकोण अधूरा है। कल आना मैं तुम्हें जीवन जीने की कला सिखाऊंगा।"
वह बहुत उतावला था। अगले दिन सुबह सवेरे उठकर जल्दी ही पहुँच गया। महापुरुष के चरणों में प्रणाम करके बैठ गया। महापुरुष बोले, "जीवन जीने की कला सीखने आये हा? "हाँ, महाराज!" उसने संक्षिप्त में उत्तर दिया। "रामधाट पर लगा स्तम्भ देखा है ?" महापुरुष बोले। "जी हाँ, महाराज! खूब अच्छी तरह देखा है।" वह बोला।" उसी के पास जाओ। जाकर जितनी स्तुति कर सकते । हो, उस स्तम्भ की करो। कल फिर आना। कहकर महापुरुष चुप हो गये।
वह आदमी सीधा रामघाट की तरफ चला गया। वहाँ कोई नहीं था। पास ही नदी बह रही थी। आवाज करती। उसने बहुती नदी में स्नान किया और स्तम्भ कल-कल की की ओर चला गया। पहले स्तम्भ के आगे सिर नवाया तत्पश्चात कहना शुरू किया, "हे महान स्तम्भ! तुम सद्वृत्तियों का उदय करने वाले हो। तुम्हें न कोई आंधी उखाड़ सकी, न तूफान। तुम्हारी जड़ें पाताल तक हैं। लाल पत्थर से बना तुम्हारा शरीर ऐतिहासिक लाल किले से भी सुन्दर है।" बस इसी तरह प्रशंसाएं - स्तुतियों करता रहा। शाम हुई तो घर चला गया।अगले दिन सुबह-सुबह फिर महापुरुष के चरणों में पहुँच गया। महापुरुष बोले, "कल जैसे कहा था किया ?" "हों, महाराज! बिल्कुल वैसा ही। पूरे दिन स्तुतियों करता रहा मैं।" उस आदमी ने कहा। "आज फिर जाओ। आज दूसरा काम करना है।" महापुरुष बोले। "क्या? आज भी स्तुति ?" वह एकदम बोला। "अरे अधीर मनुष्य। मेरी पूरी बात तो सुनो! आज तुम्हें स्तुतियों नहीं करनी, बल्कि गालियाँ देनी हैं। जितने अपशब्द बोल सकते हो, बोलने हैं।" कहकर महापुरुष चुप हो गये। "कमाल करते हैं आप! जिसकी कल प्रशंसा कर रहा था. उसे ही आज गालियाँ देनी हैं। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है। आखिर एक ही को गालियौं और स्तुतियोँ! यह तो मुश्किल है।" वह बोला। "क्या कहते हो? क्या गाली उसी को नहीं देते, जिसे जानते हो, जिसकी कभी तारीफ़ करते हो ? किसी अंजान आदमी से भी लड़े हो कभी ? जिसे जानते ही नहीं उसकी क्या खाक़ स्तुति करोगे? उससे क्या खाक लड़ोगे? अरे जिसे जानते हो, उसी की तो स्तुति करते हो । उसी को ही तो गालियों देते हो।" महापुरुष बोले। बात उसकी समझ में आ गयी थी। इसलिए बिना कुछ कहे रामघाट चला गया। आज वह नहाया नहीं। बस सीधा खड़ा हो गया और लगा गालियाँ बकने । "तुम्हारा रंग कितना बुरा है, खून जैसा रंग। खम्भे की तरह खड़े हो, न छाया, न फल। बस खड़े हो, शैतान की तरह। अरे क्यों जगह घेर रखी है तुमने ? वैसे ही हिन्दुस्तान की आबादी दिन-रात समय की तरह बढ़ रही है।" बस इसी तरह बोलता गया। जो मुँह में आया बोलता गया। आखिर शाम को फिर वापस चला आया। अगले दिन सुबह फिर महात्मा के पास पहुँच गया। महात्मा बोले, "वत्स! सीख गये जीवन जीने की कला? "
"महाराज, क्या है, जीवन जीने की कला ? आज प्यार करो कल लड़ पड़ो। अगर यही जीवन जीने की कला है तो इसे मैं पहले ही जानता हूँ। यूँ ही तीन दिन खराब करवाये आपने ।" वह बुरा सा मुँह बनाकर बोला। "अरे अधीर मनुष्य। तुम्हारी प्रवृत्ति के लोग ही लक्खी बंजारे की तरह वफ़ादार कुत्ता मारकर पछताते हैं। अरे! मेरी पूरी बात तो सुन!" महापुरुष बोले। "जी कहिए" कहकर वह चुप चाप बैठ गया । महापुरुष कुछ देर चुप रहे । उन्होंने जब देखा कि वह पूरी तरह शान्त है तो बोले," वत्स! परसों जब तुम पहली बार उसके पास से स्तुतियों करके लौटे थे तो क्या उसने कुछ इनाम दिया था।""जी नहीं महाराज! बल्कि मेरा तो पैर फिसल गया था जिससे मैं गिरता-गिरता बचा। फिर भी मैं स्तुति ही करता वह बोला। "जितनी बात पूछे सिर्फ उतना ही जवाब दो वत्स! अधिक बोलने वाले लोग ज्ञानी नहीं होते। अच्छा एक बात और बताओ रहा कल जब तुम सखूब गालियोँ बककर आये तो क्या स्तम्भ ने कोई नफ़रत दिखायी थी ? या किसी किस्म का वार किया क्या?" महात्मा बोले। "नहीं महाराज, कल तो कुछ नहीं हुआ।" वह आदमी बोला। "बस इसी तरह का जीवन जियो वत्स! उस स्तम्भ की तरह हो जाओ। स्तुतियों सुनने पर फूलो नहीं और गालियाँ सुनने पर बिदको नहीं। प्रशंसाओं व अपशब्दों से ऊपर उठो। याद रखो, किसी की प्रशंसा से तुम्हारे गुण या सद्कर्म बढ़ नहीं जाएंगे और आलोचना व घृणा से तुम्हारे सद्कर्म दुर्गुणों में नहीं बदलेंगे। जो तुम हो, वह हो। अपने आपको पहचानो। अपनी शक्ति को, क्षमता को पहचानो। इसे पहचान लोगे तो फिर कोई तुम्हें दुःखी या परेशान नहीं कर सकेगा। निर्लिप्त भाव से जीवन जियोगे तो सुख तुम्हारे पीछे भागेंगे।" यह कहकर महात्मा चुप हो गये। वह आदमी शान्त भाव से वापस लौटा और फिर उसने सुखी जीवन जिया।
