1.
जब भी कभी
जब भी कभी
प्रेम विहल होकर
आ बैठती हूँ तेरे पहलू
मिट जाते हैं आवरण मेरे
में
मात्र एक स्पर्श से
मेरे लिए अपने
मन में बसाए पाक भावों से
जब-जब करते हो श्रृंगार मेरा
टांक देते हो
फूल हरसिंगार के
मेरे लम्बे घने बालों में
खनक उठते हैं।
कंगन मेरी बाहों के
मीठी सी झंकार करती हैं।
पायल मेरे पांव की
जब मदहोश होकर "सरोज"
बांध लेते हो तुम
मुझे आलिंगन में
मुझे आलिंगन में
2.
अधखुली पलकें,
गहन अन्धेरा
चुपके से बदली की ओट से
चाँद निकल आया
चाँद की चाँदनी में
एक साया नजर आया।।
अश्व पे सवार वो
मेरी तरफ बढ़ता हुआ
हसरत तो थी
कि, तेरा दीदार कर
एक बार फिर,,
तुझ पे एतबार करें
साया धीरे -धीरे दूर हटता गया
और मेरा वजूद सिमटता गया
अचानक खुली आँख तो पाया
वो एक सपना था
दिल ने तड़प कर कहा "सरोज"
वो कब !!!
तेरा अपना था
-सरोज चावला
