कवित्री योगिता जोशी की कविताएं

लहर
मैं तो एक लहर हूँ
अपनी संपूर्ण शक्ति के साथ
टकराती हूं सागर के तट से
किंतु लेकर ख़ाली दामन
फिर लौट आऊं सिमट के
मेरी चंचलता को
चंदा अच्छी तरह समझता
खींच मुझे अपनी नगरी में
आ जाने को कहता
फिर मैं निशचलता को तज को
चंचलता अपनाती
जवार मेरी नस नस में आता
पल पल मैं मुस्काती
इतने इतने में सुबह हो जाए
चांद कहीं छुप जाए
मैं फिर टकरा जाऊं तट से
फिर लौटा आऊं सिमट के
मैं तो एक लहर हूं
मेरा है अस्तित्व यही बस
जल से टकराना और खोना
और न जाऊं कहीं पर ।

अनकही
दर्द सब को होता है।
चैन सबका खोता है।
कोई धर्म हो कोई ज़ात
कोई रंग हो कोई नस्ल
दिल सबका रोता है।
दर्द सबको होता है
कभी उसकी खामोशी भी सुनो
जो सदियों से चुप है
जिसमें बला का ज़प्त है।
जो लुट कर भी लूटता नहीं
जिस के हाथों
सब्र का दामन
छूटता नहीं
जो खोलके बयां न करे
अफसाना उसका भी होता है।
दर्द सब को होता है।
दिल सब को रोता
मगर याद रख ,मेरे दोस्त !
इंसान वही काटता है।
जो बोता है।
दर्द...
दिल....


सादगी
सादी सी सूरत सीरत है।
सादी सी अपनी तबीयत है
न छल कोई
न बल कोई
हां साफ़ मगर
यह नीयत है।
न वक्त से सीखी मक्कारी
फिर भी नहीं कोई लाचारी
फिर भी न कोई बेचैनी
नहीं कोई भी बाज़ी हारी
हम सीधे साधे लोग सही
हमें राम नाम का जोग सही
हमें झूठ बताना आया न
हमें सच्चाई कि रोग सही
हम प्रेम की धुन में रहते हैं।
धारा के संग संग बहते हैं!







 योगिता जोशी
लैकचरार अंग्रेजी
स.स.स. स्मार्ट स्कूल,भैणी बाघा, ज़िला मानसा ।

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